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Monday, February 11, 2019

उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 11, 2019     अखिलेश तिवारी     No comments   

उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी, Hindi kavitaye, Hindi gajals
उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी



उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी

 हम उन सवालों को लेकर उदास कितने थे
जवाब जिनके यहीं आसपास कितने थे

मिली तो आज किसी अजनबी सी पेश आई
इसी हयात को लेकर कयास कितने थे

हंसी, मज़ाक, अदब, महफिलें, सुखनगोई
उदासियों के बदन पर लिबास कितने थे

पड़े थे धूल में अहसास के नगीने सब
तमाम शहर में गौहरशनाश कितने थे

हमें ही फ़िक्र थी अपनी शिनाख्त की 'अखिलेश'
नहीं तो चहरे जमाने के पास कितने थे
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Sunday, February 10, 2019

The Night / Alexander Pushkin , Alexander pushkin poems

 Vikas Jain     February 10, 2019     Alexander Pushkin     No comments   

The Night / Alexander Pushkin, English poetry
The Night / Alexander Pushkin


The Night / Alexander Pushkin


My voice that is for you 
the languid one,and gentle,

Disturbs the velvet of the dark night's mantle,
By my bedside, a candle, my sad guard,

Burns, and my poems ripple and merge in flood --
And run the streams of love, run, 
full of you alone,

And in the dark, your eyes shine like the precious stones,

And smile to me, and hear I the voice:

My friend, my sweetest friend... I love... I'm yours... I'm yours! 
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Saturday, February 9, 2019

हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 09, 2019     अरुण जैमिनी     No comments   

हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी, arun jaimini poems

         हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी(pic taken from Google)



हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी


सरकारी कार्यालय में
नौकरी मांगने पहुँचा
तो अधिकारी ने पूछा-
"क्या किया है"
मैंने कहा- "एम.ए."
वो बोला- "किस में"
मैंने गर्व से कहा- "हिन्दी में"
उसने नाक सिकोंड़ी
"अच्छा… हिन्दी में एम.ए. हो
बड़े बेशर्म हो
अभी तक ज़िन्दा हो
तुमसे तो
वो स्कूल का लड़का ही अच्छा था
जो ज़रा-सी हिन्दी बोलने के कारण
इतना अपमानित हुआ
कि उसने आत्म-हत्या कर ली
अरे
इस देश के बारे में कुछ सोचो
नौकरी मांगने आए हो
जाओ भैया!
कहीं कुआँ या खाई खोजो"

मैंने कहा-
"हिन्दुस्तान में रहते
हिन्दी का विरोध
हिन्दी के प्रति
इतना प्रतिशोध"
वो बोला-
"यह हिन्दुस्तान नहीं
इंडिया है
और हिन्दी
सुहागिन भारत के माथे की
उजड़ी हुई बिन्दिया है
तुम्हारे ये हिन्दी के ठेकेदार
हर वर्ष
हिन्दी-दिवस तो मनाते हैं
पर रोज़ होती हिन्दी हत्या को
जल्दी भूल जाते हैं।"
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Friday, February 8, 2019

ताजमहल /अरुण जैमिनी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 08, 2019     अरुण जैमिनी     No comments   

ताजमहल /अरुण जैमिनी  , Hindi kavitaye

          ताजमहल /अरुण जैमिनी




ताजमहल /अरुण जैमिनी 


इंटरव्यू देने पहुंचा

हरियाणे का एक युवा बेरोजगार

एक पोस्ट के लिए

आए थे अस्सी उम्मीदवार

किसे रखना है, यह बात तय थी

इसलिए चयनकर्ताओं के सवालों में

न सुर, न ताल और न लय थी।


एक चयनकर्ता ने हरियाणवी छोरे से पूछा-

'बताओ

ताजमहल कहां है?'

हरियाणवी छोरा बोला-

'जी…रोहतक में।'

'बहुत अच्छा… बहुत अच्छा…

इतना भी नहीं जानता

नौकरी क्या खाक करेगा?'

हरियाणवी छोरा बोला,

'आगरे में बता दूं

तो क्या रख लेगा?'

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Thursday, February 7, 2019

हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 07, 2019     काका हाथरसी     No comments   

हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी, Hindi poems
हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी



हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी 

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
 सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
 है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
 कहँ 'काका', जो ऐश कर रहे रजधानी में
 नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

 पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
 हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
 जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
 इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
 कहँ 'काका' कविराय, ध्येय को भेजो लानत
 अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत
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Wednesday, February 6, 2019

The Bhuddist / Aleister Crowley - Hello Poetry

 Vikas Jain     February 06, 2019     Aleister Crowley     No comments   

The Bhuddist / Aleister Crowley, English poetry

The Bhuddist / Aleister Crowley



The Bhuddist / Aleister Crowley




There never was a face as fair as yours,
A heart as true, a love as pure and keen.
These things endure, if anything endures.
But, in this jungle, what high heaven immures
Us in its silence, the supreme serene
Crowning the dagoba, what destined die
Rings on the table, what resistless dart
Strike me I love you; can you satisfy
The hunger of my heart!

Nay; not in love, or faith, or hope is hidden
The drug that heals my life; I know too well
How all things lawful, and all things forbidden
Alike disclose no pearl upon the midden,
Offer no key to unlock the gate of Hell.
There is no escape from the eternal round,
No hope in love, or victory, or art.
There is no plumb-line long enough to sound
The abysses of my heart! 

There no dawn breaks; no sunlight penetrates
Its blackness; no moon shines, nor any star.
For its own horror of itself creates
Malignant fate from all benignant fates,
Of its own spite drives its own angel afar.
Nay; this is the great import of the curse
That the whole world is sick, and not a part.
Conterminous with its own universe
the horror of my heart!

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Tuesday, February 5, 2019

हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय / अटल बिहारी वाजपेयी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 05, 2019     अटल बिहारी वाजपेयी जी     No comments   

अटल बिहारी वाजपेयी कविता संग्रह, Hindi poems


हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग  मेरा परिचय / अटल बिहारी वाजपेयी


मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास मै दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मै
यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर
पय पीकर सब मरते आए मै अमर हुवा लो विष पीकर
अधरोंकी प्यास बुझाई है मैने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर मे ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर
मेरा स्वर्णभ मे गेहर गेहेर सागर के जल मे चेहेर चेहेर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मै
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै तेजःपुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास
शरणागत की रक्षा की है मैने अपना जीवन देकर
विश्वास नही यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहलि के खण्डहर सदियोंकी निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दु की जय तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

दुनिया के वीराने पथ पर जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर
मै आया तभि द्रवित होकर मै आया ज्ञान दीप लेकर
भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तोंसे थककर जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मैने छाती का लहु पिला पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव मे भेद नही मेरा अन्तःस्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगोंको लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयोंका वह राज मुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै वीरपुत्र मेरि जननी के जगती मे जौहर अपार
अकबर के पुत्रोंसे पूछो क्या याद उन्हे मीना बझार
क्या याद उन्हे चित्तोड दुर्ग मे जलनेवाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रो माताए तिल तिल कर जल कर हो गई अमर
वह बुझनेवाली आग नही रग रग मे उसे समाए हूं
यदि कभि अचानक फूट पडे विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम
गोपाल राम के नामोंपर कब मैने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर मे नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी
भूभाग नही शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज
मेरा इसका संबन्ध अमर मै व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैने पाया तन मन इससे मैने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दू सब कुछ इसके अर्पण
मै तो समाज की थाति हूं मै तो समाज का हूं सेवक
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥
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A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok

 Vikas Jain     February 05, 2019     Aleksandr Blok     No comments   

A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok, English poetry

A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok




A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok



A girl sang a song in the temple's chorus, 
About men, tired in alien lands, 
About the ships that left native shores, 
And all who forgot their joy to the end. 

Thus sang her clean voice, and flew up to the highness, 
And sunbeams shined on her shoulder's white -- 
And everyone saw and heard from the darkness 
The white and airy gown, singing in the light. 

And all of them were sure, that joy would burst out: 
The ships have arrived at their beach, 
The people, in the land of the aliens tired, 
Regaining their bearing, are happy and reach. 

And sweet was her voice and the sun's beams around.... 
And only, by Caesar's Gates -- high on the vault, 
The baby, versed into mysteries, mourned, 
Because none of them will be ever returned.



A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok



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