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Friday, February 22, 2019

Goodtime Jesus / James Tate , James Tate Poems

 Vikas Jain     February 22, 2019     James Tate     No comments   

Goodtime Jesus / James Tate, English poetry
Goodtime Jesus / James Tate


Goodtime Jesus / James Tate


Jesus got up one day a little
 later than usual. 
He had been dream-

ing so deep there was nothing
 left in his head. 

What was it?

A nightmare, dead bodies 
walking all around him, 
eyes rolled
back, skin falling off. 

But he wasn't afraid of that.
 It was a beau-
tiful day. How 'bout some coffee?
 Don't mind if I do.
 Take a little
ride on my donkey,

 I love that donkey. 

Hell, I love everybody.
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Wednesday, February 20, 2019

मधुशाला / हरिवंश राय बच्चन - Hindi poems

 Vikas Jain     February 20, 2019     हरिवंशराय बच्चन जी     No comments   

मधुशाला / हरिवंश राय बच्चन, Madhushala poem
मधुशाला / हरिवंश राय बच्चन (pic taken from Google)




मधुशाला भाग 1 [रूबाई १-६९] -हरिवंश राय बच्चन

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ - अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

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Wednesday, February 13, 2019

इस पार, उस पार / हरिवंशराय बच्चन - Hindi poems

 Vikas Jain     February 13, 2019     हरिवंशराय बच्चन जी     No comments   

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इस पार, उस पार / हरिवंशराय बच्चन



इस पार, उस पार / हरिवंशराय बच्चन



इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ
कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ
हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



जग में रस की नदियाँ बहती,
रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी
नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती,
मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं
यह वायु उड़ा ले जाती है;
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,
ये साधन भी छिन जाएँगे;
तब मानव की चेतनता का
आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



प्याला है पर पी पाएँगे,
है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है,
असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है,
हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता
है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही
कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का
अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



कुछ भी न किया था जब उसका,
उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर,
जो रो-रोकर हमने ढोए;
महलों के सपनों के भीतर
जर्जर खँडहर का सत्य भरा,
उर में ऐसी हलचल भर दी,
दो रात न हम सुख से सोए;
अब तो हम अपने जीवन भर
उस क्रूर कठिन को कोस चुके;
उस पार नियति का मानव से
व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



संसृति के जीवन में, सुभगे
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे
तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव, रजनी
तम की चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी
कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबे-चौड़े जग का
अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब हम दोनो का नन्हा-सा
संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



ऐसा चिर पतझड़ आएगा
कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा
जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर
‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन
करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का
अवसान, प्रिये, हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का
उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,
सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,
वह गायक-नायक सिन्धु कहीं,
चुप हो छिप जाना चाहेगा,
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;
संगीत सजीव हुआ जिनमें,
जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का
जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



उतरे इन आखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने;
जब मूर्तिमती सत्ताओं की
शोभा-सुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का
श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!


दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है;
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगीसाथी,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है;
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
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The Need To Love / Alan Seeger , Alan Seeger Poems

 Vikas Jain     February 13, 2019     Alan Seeger     No comments   

The Need To Love / Alan Seeger, alan seeger poems
The Need To Love / Alan Seeger


The Need To Love / Alan Seeger


The need to love that all the stars obey
Entered my heart and banished all beside.
Bare were the gardens where I used to stray;
Faded the flowers that one time satisfied.

Before the beauty of the west on fire,
The moonlit hills from cloister-casements viewed
Cloud-like arose the image of desire,
And cast out peace and maddened solitude.

I sought the City and the hopes it held:
With smoke and brooding vapors intercurled,
As the thick roofs and walls close-paralleled
Shut out the fair horizons of the world---

A truant from the fields and rustic joy,
In my changed thought that image even so
Shut out the gods I worshipped as a boy
And all the pure delights I used to know.

Often the veil has trembled at some tide
Of lovely reminiscence and revealed
How much of beauty Nature holds beside
Sweet lips that sacrifice and arms that yield:

Clouds, window-framed, beyond the huddled eaves
When summer cumulates their golden chains,
Or from the parks the smell of burning leaves,
Fragrant of childhood in the country lanes,

An organ-grinder's melancholy tune
In rainy streets, or from an attic sill
The blue skies of a windy afternoon
Where our kites climbed once from some grassy hill:

And my soul once more would be wrapped entire
In the pure peace and blessing of those years.
Before the fierce infection of Desire
Had ravaged all the flesh. Through starting tears

Shone that lost Paradise; but, if it did,
Again ere long the prison-shades would fall
That Youth condemns itself to walk amid,
So narrow, but so beautiful withal.

And I have followed Fame with less devotion,
And kept no real ambition but to see
Rise from the foam of Nature's sunlit ocean
My dream of palpable divinity;

And aught the world contends for to mine eye
Seemed not so real a meaning of success
As only once to clasp before I die
My vision of embodied happiness.
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Tuesday, February 12, 2019

जो बरसों तक सड़े जेल में / अटल बिहारी वाजपेयी -Hindi poems

 Vikas Jain     February 12, 2019     अटल बिहारी वाजपेयी जी     No comments   

जो बरसों तक सड़े जेल में / अटल बिहारी वाजपेयी, atal bihari vajpai poems
जो बरसों तक सड़े जेल में / अटल बिहारी वाजपेयी




जो बरसों तक सड़े जेल में / अटल बिहारी वाजपेयी

जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें।
जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें।

याद करें काला पानी को,
अंग्रेजों की मनमानी को,
कोल्हू में जुट तेल पेरते,
सावरकर से बलिदानी को।

याद करें बहरे शासन को,
बम से थर्राते आसन को,
भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू
के आत्मोत्सर्ग पावन को।

अन्यायी से लड़े,
दया की मत फरियाद करें।

उनकी याद करें।

बलिदानों की बेला आई,
लोकतंत्र दे रहा दुहाई,
स्वाभिमान से वही जियेगा
जिससे कीमत गई चुकाई
मुक्ति माँगती शक्ति संगठित,
युक्ति सुसंगत, भक्ति अकम्पित,
कृति तेजस्वी, घृति हिमगिरि-सी
मुक्ति माँगती गति अप्रतिहत।

अंतिम विजय सुनिश्चित, पथ में
क्यों अवसाद करें?
उनकी याद करें।
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Devils / Alexander Pushkin , Alexander Pushkin Poems

 Vikas Jain     February 12, 2019     Alexander Pushkin     No comments   

Devils / Alexander Pushkin, Alexander Pushkin poems
Devils / Alexander Pushkin


Devils / Alexander Pushkin



Storm-clouds hurtle, storm-clouds hover;
Flying snow is set alight
By the moon whose form they cover;
Blurred the heavens, blurred the night.
On and on our coach advances,
Little bell goes din-din-din...
Round are vast, unknown expanses;
Terror, terror is within.

-- Faster, coachman! \Can't, sir, sorry:
Horses, sir, are nearly dead.
I am blinded, all is blurry,
All snowed up; can't see ahead.
Sir, I tell you on the level:
We have strayed, we've lost the trail.
What can WE do, when a devil
Drives us, whirls us round the vale?

''There, look, there he's playing, jolly!
Huffing, puffing in my course;
There, you see, into the gully
Pushing the hysteric horse;
Now in front of me his figure
Looms up as a queer mile-mark --
Coming closer, growing bigger,
Sparking, melting in the dark.''

Storm-clouds hurtle, storm-clouds hover;
Flying snow is set alight
By the moon whose form they cover;
Blurred the heavens, blurred the night.
We can't whirl so any longer!
Suddenly, the bell has ceased,
Horses halted... -- Hey, what's wrong there?
''Who can tell! -- a stump? a beast?..''

Blizzard's raging, blizzard's crying,
Horses panting, seized by fear;
Far away his shape is flying;
Still in haze the eyeballs glare;
Horses pull us back in motion,
Little bell goes din-din-din...
I behold a strange commotion:
Evil spirits gather in --

Sundry, ugly devils, whirling
In the moonlight's milky haze:
Swaying, flittering and swirling
Like the leaves in autumn days...
What a crowd! Where are they carried?
What's the plaintive song I hear?
Is a goblin being buried,
Or a sorceress married there?

Storm-clouds hurtle, storm-clouds hover;
Flying snow is set alight
By the moon whose form they cover;
Blurred the heavens, blurred the night.
Swarms of devils come to rally,
Hurtle in the boundless height;
Howling fills the whitening valley,
Plaintive screeching rends my heart...


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Monday, February 11, 2019

मधुबाला - हरिवंशराय बच्चन - Hindi poems

 Vikas Jain     February 11, 2019     हरिवंशराय बच्चन जी     No comments   

मधुबाला - हरिवंशराय बच्चन, haribansh rai bacchan poems
मधुबाला - हरिवंशराय बच्चन(pic taken from Google)



मधुबाला - हरिवंशराय बच्चन



मैं मधुबाला मधुशाला की,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,
मधु के धट मुझपर बलिहारी,
प्यालों की मैं सुषमा सारी,
मेरा रुख देखा करती है
मधु-प्यासे नयनों की माला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



इस नीले अंचल की छाया
में जग-ज्वाला का झुलसाया
आकर शीतल करता काया,
मधु-मरहम का मैं लेपन कर
अच्छा करती उर का छाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



मधुघट ले जब करती नर्तन,
मेरे नूपुर के छम-छनन
में लय होता जग का क्रंदन,
झूमा करता मानव जीवन
का क्षण-क्षण बनकर मतवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



मैं इस आँगन की आकर्षण,
मधु से सिंचित मेरी चितवन,
मेरी वाणी में मधु के कण,
मदमत्त बनाया मैं करती,
यश लूटा करती मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



था एक समय, थी मधुशाला,
था मिट्टी का घट, था प्याला,
थी, किन्तु, नहीं साकीबाला,
था बैठा ठाला विक्रेता
दे बंद कपाटों पर ताला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



तब इस घर में था तम छाया,
था भय छाया, था भ्रम छाया,
था मातम छाया, गम छाया,
ऊषा का दीप लिए सर पर,
मैं आई करती उजियाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



सोने की मधुशाना चमकी,
माणित द्युति से मदिरा दमकी,
मधुगंध दिशाओं में चमकी,
चल पड़ा लिए कर में प्याला
प्रत्येक सुरा पीनेवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



थे मदिरा के मृत-मूक घड़े,
थे मूर्ति सदृश मधुपात्र खड़े,
थे जड़वत् प्याले भूमि पड़े,
जादू के हाथों से छूकर
मैंने इनमें जीवन डाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



मुझको छूकर मधुघट छलके,
प्याले मधु पीने को ललके ,
मालिक जागा मलकर पलकें,
अँगड़ाई लेकर उठ बैठी
चिर सुप्त विमूर्च्छित मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



प्यासे आए, मैंने आँका,
वातायन से मैंने झाँका,
पीनेवालों का दल बाँका,
उत्कंठित स्वर से बोल उठा,
‘कर दे पागल, भर दे प्याला!’
मैं मधुशाला की मधुबाला!



खुल द्वार गए मदिरालय के,
नारे लगते मेरी जय के,
मिट चिह्न गए चिंता भय के,
हर ओर मचा है शोर यही,
‘ला-ला मदिरा ला-ला’!,
मैं मधुशाला की मधुबाला!


हर एक तृप्ति का दास यहाँ,
पर एक बात है खास यहाँ,
पीने से बढ़ती प्यास यहाँ,
सौभाग्य मगर मेरा देखो,
देने से बढ़ती है हाला!
मैं मधुशाला की मधुबाला!



चाहे जितना मैं दूँ हाला,
चाहे जितना तू पी प्याला,
चाहे जितना बन मतवाला,
सुन, भेद बताती हूँ अन्तिम,
यह शांत नही होगी ज्वाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!



मधु कौन यहाँ पीने आता,
है किसका प्यालों से नाता,
जग देख मुझे है मदमाता,
जिसके चिर तंद्रिल नयनों पर
तनती मैं स्वप्नों का जाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!


यह स्वप्न-विनिर्मित मधुशाला,
यह स्वप्न रचित मधु का प्याला,
स्वप्निल तृष्णा, स्वप्निल हाला,
स्वप्नों की दुनिया में भूला
फिरता मानव भोलाभाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
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String Bass / Adrian Green , poem's of Adrian Green

 Vikas Jain     February 11, 2019     Adrian Green     No comments   

String Bass / Adrian Green, Adrian Green poems
String Bass / Adrian Green


String Bass / Adrian Green


Some like to dominate,
others caress
a voluptuous rhythm
on pliant strings.

This pulse drives life
through wanton counterpoint,
the heart and harmony
of things.
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उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 11, 2019     अखिलेश तिवारी     No comments   

उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी, Hindi kavitaye, Hindi gajals
उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी



उदास कितने थे--गजल / अखिलेश तिवारी

 हम उन सवालों को लेकर उदास कितने थे
जवाब जिनके यहीं आसपास कितने थे

मिली तो आज किसी अजनबी सी पेश आई
इसी हयात को लेकर कयास कितने थे

हंसी, मज़ाक, अदब, महफिलें, सुखनगोई
उदासियों के बदन पर लिबास कितने थे

पड़े थे धूल में अहसास के नगीने सब
तमाम शहर में गौहरशनाश कितने थे

हमें ही फ़िक्र थी अपनी शिनाख्त की 'अखिलेश'
नहीं तो चहरे जमाने के पास कितने थे
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Sunday, February 10, 2019

The Night / Alexander Pushkin , Alexander pushkin poems

 Vikas Jain     February 10, 2019     Alexander Pushkin     No comments   

The Night / Alexander Pushkin, English poetry
The Night / Alexander Pushkin


The Night / Alexander Pushkin


My voice that is for you 
the languid one,and gentle,

Disturbs the velvet of the dark night's mantle,
By my bedside, a candle, my sad guard,

Burns, and my poems ripple and merge in flood --
And run the streams of love, run, 
full of you alone,

And in the dark, your eyes shine like the precious stones,

And smile to me, and hear I the voice:

My friend, my sweetest friend... I love... I'm yours... I'm yours! 
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Saturday, February 9, 2019

हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 09, 2019     अरुण जैमिनी     No comments   

हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी, arun jaimini poems

         हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी(pic taken from Google)



हिन्दी हत्या / अरुण जैमिनी


सरकारी कार्यालय में
नौकरी मांगने पहुँचा
तो अधिकारी ने पूछा-
"क्या किया है"
मैंने कहा- "एम.ए."
वो बोला- "किस में"
मैंने गर्व से कहा- "हिन्दी में"
उसने नाक सिकोंड़ी
"अच्छा… हिन्दी में एम.ए. हो
बड़े बेशर्म हो
अभी तक ज़िन्दा हो
तुमसे तो
वो स्कूल का लड़का ही अच्छा था
जो ज़रा-सी हिन्दी बोलने के कारण
इतना अपमानित हुआ
कि उसने आत्म-हत्या कर ली
अरे
इस देश के बारे में कुछ सोचो
नौकरी मांगने आए हो
जाओ भैया!
कहीं कुआँ या खाई खोजो"

मैंने कहा-
"हिन्दुस्तान में रहते
हिन्दी का विरोध
हिन्दी के प्रति
इतना प्रतिशोध"
वो बोला-
"यह हिन्दुस्तान नहीं
इंडिया है
और हिन्दी
सुहागिन भारत के माथे की
उजड़ी हुई बिन्दिया है
तुम्हारे ये हिन्दी के ठेकेदार
हर वर्ष
हिन्दी-दिवस तो मनाते हैं
पर रोज़ होती हिन्दी हत्या को
जल्दी भूल जाते हैं।"
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Friday, February 8, 2019

ताजमहल /अरुण जैमिनी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 08, 2019     अरुण जैमिनी     No comments   

ताजमहल /अरुण जैमिनी  , Hindi kavitaye

          ताजमहल /अरुण जैमिनी




ताजमहल /अरुण जैमिनी 


इंटरव्यू देने पहुंचा

हरियाणे का एक युवा बेरोजगार

एक पोस्ट के लिए

आए थे अस्सी उम्मीदवार

किसे रखना है, यह बात तय थी

इसलिए चयनकर्ताओं के सवालों में

न सुर, न ताल और न लय थी।


एक चयनकर्ता ने हरियाणवी छोरे से पूछा-

'बताओ

ताजमहल कहां है?'

हरियाणवी छोरा बोला-

'जी…रोहतक में।'

'बहुत अच्छा… बहुत अच्छा…

इतना भी नहीं जानता

नौकरी क्या खाक करेगा?'

हरियाणवी छोरा बोला,

'आगरे में बता दूं

तो क्या रख लेगा?'

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Thursday, February 7, 2019

हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 07, 2019     काका हाथरसी     No comments   

हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी, Hindi poems
हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी



हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी 

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
 सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
 है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
 कहँ 'काका', जो ऐश कर रहे रजधानी में
 नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में

 पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
 हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
 जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
 इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
 कहँ 'काका' कविराय, ध्येय को भेजो लानत
 अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत
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Wednesday, February 6, 2019

The Bhuddist / Aleister Crowley - Hello Poetry

 Vikas Jain     February 06, 2019     Aleister Crowley     No comments   

The Bhuddist / Aleister Crowley, English poetry

The Bhuddist / Aleister Crowley



The Bhuddist / Aleister Crowley




There never was a face as fair as yours,
A heart as true, a love as pure and keen.
These things endure, if anything endures.
But, in this jungle, what high heaven immures
Us in its silence, the supreme serene
Crowning the dagoba, what destined die
Rings on the table, what resistless dart
Strike me I love you; can you satisfy
The hunger of my heart!

Nay; not in love, or faith, or hope is hidden
The drug that heals my life; I know too well
How all things lawful, and all things forbidden
Alike disclose no pearl upon the midden,
Offer no key to unlock the gate of Hell.
There is no escape from the eternal round,
No hope in love, or victory, or art.
There is no plumb-line long enough to sound
The abysses of my heart! 

There no dawn breaks; no sunlight penetrates
Its blackness; no moon shines, nor any star.
For its own horror of itself creates
Malignant fate from all benignant fates,
Of its own spite drives its own angel afar.
Nay; this is the great import of the curse
That the whole world is sick, and not a part.
Conterminous with its own universe
the horror of my heart!

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Tuesday, February 5, 2019

हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय / अटल बिहारी वाजपेयी - Hindi poems

 Vikas Jain     February 05, 2019     अटल बिहारी वाजपेयी जी     No comments   

अटल बिहारी वाजपेयी कविता संग्रह, Hindi poems


हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग  मेरा परिचय / अटल बिहारी वाजपेयी


मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार क्षार
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार
रणचंडी की अतृप्त प्यास मै दुर्गा का उन्मत्त हास
मै यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार
फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूं मै
यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर
पय पीकर सब मरते आए मै अमर हुवा लो विष पीकर
अधरोंकी प्यास बुझाई है मैने पीकर वह आग प्रखर
हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको पल भर मे ही छूकर
भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन
मै नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग मैने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान
मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर
मेरा स्वर्णभ मे गेहर गेहेर सागर के जल मे चेहेर चेहेर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मै
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै तेजःपुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैने प्रकाश
जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास
शरणागत की रक्षा की है मैने अपना जीवन देकर
विश्वास नही यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहलि के खण्डहर सदियोंकी निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दु की जय तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

दुनिया के वीराने पथ पर जब जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब जब मानव सब कुछ खोकर
मै आया तभि द्रवित होकर मै आया ज्ञान दीप लेकर
भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तोंसे थककर जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मैने छाती का लहु पिला पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव मे भेद नही मेरा अन्तःस्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगोंको लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयोंका वह राज मुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरिट तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै वीरपुत्र मेरि जननी के जगती मे जौहर अपार
अकबर के पुत्रोंसे पूछो क्या याद उन्हे मीना बझार
क्या याद उन्हे चित्तोड दुर्ग मे जलनेवाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रो माताए तिल तिल कर जल कर हो गई अमर
वह बुझनेवाली आग नही रग रग मे उसे समाए हूं
यदि कभि अचानक फूट पडे विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम
गोपाल राम के नामोंपर कब मैने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर मे नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी
भूभाग नही शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज
मेरा इसका संबन्ध अमर मै व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैने पाया तन मन इससे मैने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दू सब कुछ इसके अर्पण
मै तो समाज की थाति हूं मै तो समाज का हूं सेवक
मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥
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A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok

 Vikas Jain     February 05, 2019     Aleksandr Blok     No comments   

A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok, English poetry

A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok




A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok



A girl sang a song in the temple's chorus, 
About men, tired in alien lands, 
About the ships that left native shores, 
And all who forgot their joy to the end. 

Thus sang her clean voice, and flew up to the highness, 
And sunbeams shined on her shoulder's white -- 
And everyone saw and heard from the darkness 
The white and airy gown, singing in the light. 

And all of them were sure, that joy would burst out: 
The ships have arrived at their beach, 
The people, in the land of the aliens tired, 
Regaining their bearing, are happy and reach. 

And sweet was her voice and the sun's beams around.... 
And only, by Caesar's Gates -- high on the vault, 
The baby, versed into mysteries, mourned, 
Because none of them will be ever returned.



A Girl Sang A Song / Aleksandr Blok



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Tuesday, January 29, 2019

Cinderella / Anne Sexton

 Vikas Jain     January 29, 2019     Anne Sexton     No comments   

Cinderella / Anne Sexton, English poetry

Cinderella / Anne Sexton



Cinderella / Anne Sexton



You always read about it:
the plumber with the twelve children
who wins the Irish Sweepstakes.
From toilets to riches.
That story.

Or the nursemaid,
some luscious sweet from Denmark
who captures the oldest son's heart.
from diapers to Dior.
That story.

Or a milkman who serves the wealthy,
eggs, cream, butter, yogurt, milk,
the white truck like an ambulance
who goes into real estate
and makes a pile.
From homogenized to martinis at lunch.

Or the charwoman
who is on the bus when it cracks up
and collects enough from the insurance.
From mops to Bonwit Teller.
That story.

Once
the wife of a rich man was on her deathbed
and she said to her daughter Cinderella:
Be devout. Be good. Then I will smile
down from heaven in the seam of a cloud.
The man took another wife who had
two daughters, pretty enough
but with hearts like blackjacks.
Cinderella was their maid.
She slept on the sooty hearth each night
and walked around looking like Al Jolson.
Her father brought presents home from town,
jewels and gowns for the other women
but the twig of a tree for Cinderella.
She planted that twig on her mother's grave
and it grew to a tree where a white dove sat.
Whenever she wished for anything the dove
would drop it like an egg upon the ground.
The bird is important, my dears, so heed him.

Next came the ball, as you all know.
It was a marriage market.
The prince was looking for a wife.
All but Cinderella were preparing
and gussying up for the event.
Cinderella begged to go too.
Her stepmother threw a dish of lentils
into the cinders and said: Pick them
up in an hour and you shall go.
The white dove brought all his friends;
all the warm wings of the fatherland came,
and picked up the lentils in a jiffy.
No, Cinderella, said the stepmother,
you have no clothes and cannot dance.
That's the way with stepmothers.

Cinderella went to the tree at the grave
and cried forth like a gospel singer:
Mama! Mama! My turtledove,
send me to the prince's ball!
The bird dropped down a golden dress
and delicate little slippers.
Rather a large package for a simple bird.
So she went. Which is no surprise.
Her stepmother and sisters didn't
recognize her without her cinder face
and the prince took her hand on the spot
and danced with no other the whole day.

As nightfall came she thought she'd better
get home. The prince walked her home
and she disappeared into the pigeon house
and although the prince took an axe and broke
it open she was gone. Back to her cinders.
These events repeated themselves for three days.
However on the third day the prince
covered the palace steps with cobbler's wax
and Cinderella's gold shoe stuck upon it.
Now he would find whom the shoe fit
and find his strange dancing girl for keeps.
He went to their house and the two sisters
were delighted because they had lovely feet.
The eldest went into a room to try the slipper on
but her big toe got in the way so she simply
sliced it off and put on the slipper.
The prince rode away with her until the white dove
told him to look at the blood pouring forth.
That is the way with amputations.
They just don't heal up like a wish.
The other sister cut off her heel
but the blood told as blood will.
The prince was getting tired.
He began to feel like a shoe salesman.
But he gave it one last try.
This time Cinderella fit into the shoe
like a love letter into its envelope.

At the wedding ceremony
the two sisters came to curry favor
and the white dove pecked their eyes out.
Two hollow spots were left
like soup spoons.

Cinderella and the prince
lived, they say, happily ever after,
like two dolls in a museum case
never bothered by diapers or dust,
never arguing over the timing of an egg,
never telling the same story twice,
never getting a middle-aged spread,
their darling smiles pasted on for eternity.
Regular Bobbsey Twins.
That story.
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Sound And Sense / Alexander Pope, poems by Alexander Pope

 Vikas Jain     January 29, 2019     Alexander Pope     No comments   

Sound And Sense / Alexander Pope, English poetry

 Alexander Pope (pic taken from Google)



Sound And Sense / Alexander Pope



True ease in writing comes from art,
 not chance,

As those move easiest 
who have learned to dance.

'Tis not enough no harshness gives offense,
The sound must seem an echo to the sense:

Soft is the strain when Zephyr gently blows,
And the smooth stream in smoother numbers flows;

But when loud surges lash the sounding shore,
The hoarse, rough verse should like the torrent roar;

When Ajax strives some rock's vast weight to throw,
The line too labors, and the words move slow;

Not so, when swift Camilla scours the plain,
Flies o'er the unbending corn, and skims along the main.

Hear how Timotheus' varied lays surprise,
And bid alternate passions fall and rise!


Sound And Sense / Alexander Pope


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Monday, January 28, 2019

कुत्ते तभी भौंकते हैं / अल्हड़ बीकानेरी - Hindi Poems

 Vikas Jain     January 28, 2019     अल्हड़ बीकानेरी     No comments   

कुत्ते तभी भौंकते हैं / अल्हड़ बीकानेरी, Hindi kavitaye

कुत्ते तभी भौंकते हैं / अल्हड़ बीकानेरी



कुत्ते तभी भौंकते हैं / अल्हड़ बीकानेरी


रामू जेठ बहू से बोले, मत हो बेटी बोर
कुत्ते तभी भौंकते हैं जब दिखें गली में चोर
वफ़ादार होते हैं कुत्ते, नर हैं नमक हराम
मिली जिसे कुत्ते की उपमा, चमका उसका नाम
दिल्ली क्या, पूरी दुनिया में मचा हुआ है शोर
हैं कुत्ते की दुम जैसे ही, टेढ़े सभी सवाल
जो जबाव दे सके, कौन है वह माई का लाल
देख रहे टकटकी लगा, सब स्वीडन की ओर
प्रजातंत्र का प्रहरी कुत्ता, करता नहीं शिकार
रूखा-सूखा टुकड़ा खाकर लेटे पाँव पसार
बँगलों के बुलडॉग यहाँ सब देखे आदमख़ोर
कुत्ते के बजाय कुरते का बैरी, यह नाचीज़
मुहावरों के मर्मज्ञों को, इतनी नहीं तमीज़
पढ़ने को नित नई पोथियाँ, रहे ढोर के ढोर
दिल्ली के कुछ लोगों पर था चोरी का आरोप
खोजी कुत्ता लगा सूँघने अचकन पगड़ी टोप
जकड़ लिया कुत्ते ने मंत्री की धोती का छोर
तो शामी केंचुआ कह उठा, 'हूँ अजगर' का बाप
ऐसी पटकी दी पिल्ले ने, चित्त हुआ चुपचाप
साँपों का कर चुके सफाया हरियाणा के मोर।


कुत्ते तभी भौंकते हैं / अल्हड़ बीकानेरी


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सुबह की तस्वीरे - 1 / अजित कुमार - Hindi Poems

 Vikas Jain     January 28, 2019     अजित कुमार     No comments   

 
सुबह की तस्वीरे - 1 / अजित कुमार, Hindi kavitaye

   सुबह की तस्वीरे - 1 / अजित कुमार



सुबह की तस्वीरे - 1 / अजित कुमार




सुबह चिड़ियों के मधुर स्वर गूँजते हैं।

और पंडित जी नहा-धोकर,
बड़े ही मग्न होकर
लगा आसन, भागवत-गीता उठाकर
पाठ करते, कृष्ण-राधा की कथा गाते हुए
अति भक्ति-विहल जान पड़ते,
और अपनी तान पर, लय पर
स्वयं ही ऊंघते हैं।

देवता आकाश के
यह देखकर अभिमान से भरते
कि धरती के मनुज उनको अभी तक पूजते हैं,
किन्तु बेचारे नहीं यह जान पाते-
आज का इंसान ख़ुद को पूजता है,
और जो सच्चे पुजारी
देवताओं के, प्रकृति के--
बच गये हैं:
वे वही हैं जो
बड़े तड़के मधुर पावन स्वरों में,
वनों में, पथ में, जगत भर में
विहग-दल कूजते हैं ।

सुबह चिड़ियों के मधुर स्वर गूँजते है।



सुबह की तस्वीरे - 1 / अजित कुमार


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