मार दी तुझे पिचकारी,
कौन री, रँगी छबि यारी ?
फूल -सी देह,- द्युति सारी,
हल्की तूल-सी सँवारी,
रेणुओं-मली सुकुमारी,
कौन री, रँगी छबि वारी ?
मुसका दी, आभा ला दी,
उर-उर में गूँज उठा दी,
फिर रही लाज की मारी,
मौन री रँगी छबि प्यारी।
-सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला


0 Comments:
Post a Comment